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'लव जिहाद' क्या है? व 'लव जिहाद' के लिए कानून कितना जायज है?

 'लव जिहाद' क्या है? व 'लव जिहाद' पर कानून कितना जायज है?


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सबसे पहले 'लव जिहाद' को समझते हैं। 'लव' शब्द से आप सभी लोग भलीभांति परिचित हैं। 'जिहाद' एक अरबी शब्द है जिसका तात्पर्य 'संघर्ष' होता है। इस प्रकार प्रेम के लिए किया गया संघर्ष 'लव जिहाद' कहलाता है। परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह समझ नही आ रहा है कि 'लव' जिहाद के लिए किया जा रहा है या 'जिहाद' लव के लिए। इसकी उत्पत्ति के विषय में यह कहा जाता है कि 'लव जिहाद' की उतपत्ति 2007 में गुजरात में एक केस से हुआ था परन्तु सबसे पहले 2009 में यह राष्ट्र पटल पर तब आया जब केरल और कर्नाटक की सरकारों ने यह कहा कि लगभग 4000 हिन्दू लड़कियों को प्रलोभन देकर मुस्लिम धर्म अपनाया जा रहा है और 2014 आते-आते जन-जन तक इसकी चर्चा तब होने लगी जब आरएसएस के एक द्विसाप्ताहिक पत्रिका 'पांचजन्य' में

'लव जिहाद' पर एक लेख 'प्यार अंधा है या धंधा' आया। जिसमें यह लिखा गया कि 'एक मुस्लिम लड़का हिन्दू लड़की को स्कूल व कालेज में पार्टी, थिएटर व पर्यटन का प्रलोभन देकर प्रेम प्रसंग बनाते हैं और उसे मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए प्रभावित करते हैं। इस प्रकार किया गया कृत्य संगठित अपराध की श्रेणी में आना चाहिए।'


कानून व्यक्ति को सीमाओं में जरूर बाँधता है परंतु उसकी भी  एक सीमा होती है। प्रत्येक कानून संविधान के एक निश्चित दायरे रहकर ही बनाया जाना चाहिए। कई महीनों से ही देश की कई राज्य सरकारें 'लव जिहाद' पर कानून बनाने के लिए कह रही थी और हाल ही में उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस पर एक अध्यादेश बना दिया है। हालांकि इस कानून में कही भी 'लव जिहाद' का जिक्र नही किया गया है और इस अध्यादेश का नाम ' उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन अध्यादेश' है। फिर भी विपक्ष इसे साम्प्रदायिक मुद्दे के चश्मे से देख रहा है। ज्ञातव्य हो कि विवाह व तलाक समवर्ती सूची के विषय हैं। इस लिहाज से राज्य सरकारें कानून बना सकती हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कानून तब बनाया है जब प्रयागराज हाइकोर्ट ने अपने पहले सुनाए गए निर्णय को निरस्त करते हुए कहा है कि आस्था में परिवर्तन के बगैर जबरन या सिर्फ शादी के लिए किया गया धर्मपरिवर्तन जायज़ नही है। अगर हम साम्प्रदायिक मुद्दे के चश्में इतर हटकर देखें तो यह समझ आएगा कि यह कानून आज कितना जायज है? ऐसा नही है कि यह मुस्लिम लड़के द्वारा किसी हिन्दू लड़की से विवाह करने को रोकने के लिए ही बनाया गया है बल्कि इसका दुरुपयोग हिन्दू पक्ष द्वारा भी किया जाने लगा था। हिन्दू विवाह अधिनियम में हिन्दू को मात्र एक विवाह करने की अनुमति है लेकिन अगर वह धर्म परिवर्तित करके मुस्लिम कर लेता है तो वह दूसरा विवाह भी कर सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता तभी तक जायज है जब तक हमारे मूल अधिकारों का हनन नही होता है।


इस अधिनियम में यह बिल्कुल नही कहा गया कि धर्म परिवर्तन करना विधि विरुद्ध ही होगा। इस कानून के तहत बस धर्म परिवर्तन के लिए कुछ सीमाएं तय की गई हैं। इसके लिए धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को 2 महीने पहले जिला मजिस्ट्रेट को कारण सहित यह बताना होगा कि वह धर्म परिवर्तन क्यों कर रहा है? और अगर वह इस संबंध में गलत सूचना देता है तब ही उसके द्वारा किया गया धर्म परिवर्तन विधि विरुद्घ होगा। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस कानून पर कड़ा रुख़ अख़्तियार करते हुए इसे गैरजमानती बना दिया है।


उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जैसे ही यह अध्यादेश लाया गया है तबसे कई लेख आ चुकें और इस कानून को संविधान के दायरे से बाहर बताने की होड़ मची हुई है। इनका कहना है कि यह कानून लोगों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता है। परंतु हमें यह ध्यान देने योग्य है कि कोई भी स्वतंत्रता स्वछंदता में नही परिवर्तित होनी चाहिए और अगर स्वतंत्रता स्वछंदता में परिवर्तित होने लगे तो उसे सीमाओं में बांधना जरूरी है और यह सीमा कानून है। राजनीति शास्त्री होब्स ने अपने सिद्धान्त 'सामाजिक समझौता' के माध्यम से सुझाया है था प्राचीन समाज में राजव्यवस्था का कोई अस्तित्व नही था। समाज के व्यक्ति स्वयं अपना कर्तव्य समझते थे और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनमें अराजकता आने लगी और इस अराजकता की वजह से 'राजव्यवस्था' का पदार्पण हुआ ताकि समाज को सुदृढ़ ढंग से संचालित किया जा सके। इसलिए धर्म परिवर्तन से होने वाले अराजक कार्यों को रोकने के लिए यह कानून महती है। 


#LoveJihad


♦️₹♦️

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