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गरीबी के मायने।

गरीबी के मायने...!

हाल ही में सयुंक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफ़ोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिसिएटिव ने गरीबी पर एक सूचकांक जारी किया है। यह सूचकांक गरीबी के अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर तैयार किया गया है। जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, जल व जीवन की गुणवत्ता के आधार पर ही नही तय किया गया है बल्कि इस बार इन आवश्यकताओं की पहुंच के आधार पर तय किया गया है । जैसे किसी क्षेत्र में जल की उपलब्धता है तो शिक्षा की पहुंच नही है और किसी क्षेत्र विशेष में अधिक इन सुविधाओं की पहुंच है तो किसी क्षेत्र में नही। इसलिए उस क्षेत्र में पानी की उपलब्धता या हासिल करने की कठिनाई, शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल की दूरी, खाना पकाने में लिए कूकिंग गैस और जीवन स्तर में स्वच्छ्ता के महत्व के आधार पर शौचालयों का निर्माण आदि। इस आधार पर भारत 2006 से 2016 तक के दस वर्षों में विश्व मे सबसे अधिक गरीबी से मुक्त कराने वाला देश बना है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में हमारी सरकार ने काफी जनकल्याण योजनाएं चलाई हैं जो धरातल तक पहुंच सकी हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में नागरिकों की जीवन गुणवत्ता स्तर में सुधार हुआ है।

हाल ही में एक रिपोर्ट बताती है कि 29 वर्ष पहले भारत की जी डी पी विश्व में 35 वें स्थान पर थी और मानव विकास सूचकांक 135 था। पर पिछले वर्ष हुए सर्वेक्षण में भारत विश्व की 6 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना है और मानव विकास सूचकांक में मात्र पांच अंक फिसल कर 130 वें स्थान पर पहुंचा हैं। इससे क्या अंदाजा लगाया जाए? कि अर्थव्यवस्था के हिसाब से भारत वृद्धि कर रहा है परन्तु नागरिकों के जीवन स्तर उनकी गुणवत्ता में सुधार नही कर पा रहा है। भारत में गरीबी को मापने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्र्ष्टाचार, भुखमरी और कुपोषण जैसे 10 पैरामीटर्स को देखा जाता है। मेरी यह समझ नही आता कि शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्र्ष्टाचार व भुखमरी आदि में जो अंतराष्ट्रीय सर्वेक्षण आते हैं भारत उनमे निम्न स्तर का प्रदर्शन कर रहा है। फिर भी गरीबी खत्म होती जा रही है। कुछ वर्ष पहले विश्व बैंक की एक रिपोर्ट आयी थी जिसमे कहा गया था 2004 से 2011 के बीच भारत में गरीबों की संख्या 38.9% से घटकर 21.2% पहुंच गया। और अमेरिका की एक शोध संस्था ने तो यहां तक कह दिया कि भारत में हर एक मिनट में 40 लोग गरीबी से मुक्त हो रहे हैं। यदि हाल में सयुंक्त विकास कार्यक्रम के इस रिपोर्ट को भी ले ले कि भारत में विश्व में गरीबी सबसे तीव्र गति से गिर रही है तो इससे आशय लगाया जा सकता है कि भारत में लगभग गरीबी समाप्त होने वाली है। फिर भी हमारे देश में लगभग एक तिहाई जनसँख्या गरीब है। लगभग हर चुनावी घोषणाओं में गरीबी का जिक्र होता है। आखिर इसका क्या कारण हो सकता है? क्या हमारे और अंतराष्ट्रीय मनको में गरीबी की परिभाषा में अंतर है? अगर अंतर है तो किस प्रकार का अंतर है?

चार वर्ष पहले  नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में  गरीबी को परिभाषित करने और इसको कम करने के लिए एक कमेटी बनाई थी फिर भी आजतक गरीबी की स्पष्ठ परिभाषा नही बन पाई। आखिर क्या है गरीबी? क्या बुनियादी सुविधाओं जैसे खाने, पीने व रहने से संबंधित सेवाओं से वंचित रहने वालों को गरीब कहा जायेगा या अंतराष्ट्रीय मानकों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्र्ष्टाचार, कुपोषण और जीवन की गुणवत्ता के आधार पर  पिछड़े लोगों को गरीब कहा जाए? इसलिए गरीबी की स्पष्ठ परिभाषा न होने की वजह से कि किस आधार पर गरीबी मापी जाए यह अनुमान लगाना कठिन है कि भारत में गरीबी का सही आंकड़ा क्या है?

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